नई दिल्ली डेस्क/ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा संसदीय सचिव के पद पर तैनात आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों को लाभ के पद के दायरे से बाहर रखने वाले विधेयक को नामंजूर किये जाने के साथ ही सूबे की सियासत में भूचाल आ गया है। इस मुद्दे पर कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी की ओर से बयानों की होड़ लग गयी है। केजरीवाल सरकार ने 13 मार्च, 2015 को एक अधिसूचना जारी कर आप के 21 विधायकों को मंत्रियों का संसदीय सचिव बनाया। विपक्ष का यह आरोप है कि सरकार को बाद में यह समझ आया कि उसने गलत नियुक्ति कर दी है, लिहाजा उसने जून, 2015 में विधानसभा का सत्र बुलाकर एक विधेयक पारित कराया। इसमें कहा गया कि मंत्रियों के संसदीय सचिवों के पद को लाभ का पद नहीं माना जायेगा।
इस विधयेक को केंद्र सरकार व राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा। राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी देने से इंकार कर दिया। वहीं, प्रशांत पटेल नाम के एक वकील ने राष्ट्रपति के समक्ष एक याचिका पेश की जिसमें कहा गया कि आप सरकार ने अपने 21 विधायकों को गैरकानूनी तरीके से संसदीय सचिव बनाया है। इन्हें तुरंत अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति ने इस मामले को जांच के लिए चुनाव आयोग को भेजा। आयोग ने इन सभी 21 विधायकों को नोटिस जारी कर इनके जवाब मांगे। आयोग अगले महीने इस मामले में सुनवाई करेगा।
इन विधायकों की कुर्सी लगी है दांव पर : प्रवीण कुमार, शरद कुमार, आदर्श शास्त्री, मदनलाल, शिवचरण गोयल, संजीव झा, नरेश यादव, जरनैल सिंह (तिलक नगर), राजेश गुप्ता, राजेश ऋषि, अनिल कुमार वाजपेयी, सोमदत्त, अवतार सिंह कालका, विजेन्द्र गर्ग, जरनैल सिंह (राजौरी गार्डन), कैलाश गहलोत, अलका लांबा, नितिन त्यागी, मनोज कुमार और सरिता सिंह।

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