TIL Desk Bundelkhand/ समय चुनाव का हैं और बात धन बल, बाहुबल व् जाति बल की न हो ऐसा हो ही नहीं सकता | सामान्यतः सभी राजनीतिक दल ऐसे प्रत्याशी चुनते हैं जो इन् सबमे महारत रखता हो, इलेक्शन जीतने की कूबत हो | ऐसे नेता बिरले ही हैं जो ईमानदारी की मिसाल होते हैं और उपरोक्त तीनो विशेषताओं के बिना अपनी छवि व् जनता से सीधे जुड़ाव के बल पर ही चुनाव जीतते हैं | बुंदेलखंड के बाँदा में ज़मीन से जुड़े ऐसे ही नेता हैं जमुना प्रसाद बोस | संपत्ति के नाम पर बिलकुल शून्य | बाहुबली दूर-दूर तक नहीं | जाति के कायस्थ जिसके वोटर मुठ्ठी भर लोग ही हैं | तभी उन्हें “बुंदेलखंड का गाँधी” भी कहा जाता हैं |
बात जब जमुना प्रसाद बोस की उठी हैं तो यह भी जान लेना ज़रूरी हैं कि बाँदा सदर से वे चार बार विधायक चुने गये | यू0 पी0 में रामनरेश यादव, बनारसी दास व् मुलायम सिंह यादव की सरकारों में तीन बार कैबिनेट मंत्री रहे | पहला चुनाव वे 1974 में जीते | वर्ष 1978 का चुनाव जीतने के बाद पहली बार मंत्री बने | पर लखनऊ में बंगला लेने से इंकार कर दिया | बोले मुझे रहने को कोई छोटा सा कमरा दे दो | बाँदा में भी किराये के छोटे से मकान में रहते थे | पर शख्शियत ऐसी कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्र शेखर तक उनकी ईमानदारी के गुण गाते थे | खांटी समाजवादी नेता “बोस” जी को यह उपाधि गोवा की आज़ादी में अग्रणी योगदान के लिए मिली | बहुत से लोग उन्हें बंगाली समझते थे पर वह कायस्थ बिरादरी में निगम उपजाति के हैं | मैंने उन्हें विधानसभा तो छोड़िये लोकसभा जैसे बड़े चुनाव में एक खटारा जीप या किसी की मोटर साईकिल में बैठकर चुनावी दौरा करते देखा हैं | ग़रीबी का आलम यह रहा कि एक ही कम्बल में लिपट कर पूरा परिवार जाड़ो की सर्द भरी राते काटता था | एक चुनाव की उधारी अगले चुनाव में समर्थको के चंदे की रकम से चुकाई जाती थी | एक समय वह भी था जब बोस जी के पास नामांकन की जमानत राशि जमा करने को दस हज़ार रुपये नगद न थे | तब चंद्रशेखर ने यह पैसा भिजवा कर उनका पर्चा भरवाया |
ग़रीबो, मज़लूमो, भूमिहीनों की लड़ाई ज़मीन से जुड़कर लड़ने वाले जमुना प्रसाद बोस जैसे नेता मुट्ठी भर ही हैं | हाँ, जार्ज फर्नांडीज़, मधुलिमये व् चंद्रशेखर जैसे बड़े नाम वालों तक के लिए वे सदैव एक आदर्श पुरुष ही रहे | आपातकाल के 19 महीने जेल में काटने वालों में भी वे एक हैं | आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेज़ो ने उन्हें कई बार जेल भेजा | पर उन्होंने आज तक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियो की सूची में सुविधाएं पाने के लिए अपना नाम नहीं दर्ज़ करवाया | पहले कभी रिक्शे पर नहीं चले, कहते थे एक इंसान दूसरे इंसान का बोझ ढोये उन्हें पसंद नहीं | शायद यही कारण हैं की ऐसे बुज़ुर्ग जन नेताओं को आज राजनीतिक दलों ने भी केवल अपने मंचो कि शोभा ही मान लिया हैं | वर्ना राज्यसभा, विधानपरिषद् जैसी जगहों में मनोनीत कर उन्हें उनकी सेवाओं का फल देने की भी बात सोचतें |
सुधीर निगम
रेजिडेंट एडिटर
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