TIL Desk Lucknow/ उत्तर प्रदेश में टीबी के विनाशकारी स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक परिणामों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने की कोशिशों के क्रम में, भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के डॉ वेलुमणि जैसे दिग्गजों और जीई हेल्थकेयर तथा इंटेल इंडिया स्टार्टअप प्रोग्राम जैसे निजी क्षेत्र के प्रयासों से समर्थित, मुंबई स्थित स्वास्थ्य-तकनीक स्टार्टअप, हेस्टैकएनालिटिक्स ने एक पैनल चर्चा का आयोजन किया है। इसमें अग्रणी पल्मोनोलॉजिस्ट शामिल हुए ताकि भारत में टीबी की महामारी को खत्म करने के प्रयासों को तेज किया जा सके।
आम लोगों को यह बताने की दृढ़ पहल के साथ इसमें बताया गया कि कैसे होल (संपूर्ण) जीनोम सीक्वेंसिंग (डब्ल्यूजीएस) भारत में टीबी का पता लगाने और इलाज के लिए एक क्रांतिकारी, वन स्टॉप समाधान के रूप में उभर सकता है। हेस्टैकएनालिटिक्स ने इस मौके पर डॉ राजेंद्र प्रसाद, निदेशक, चिकित्सा शिक्षा और प्रमुख, पल्मोनरी मेडिसिन, ईरा’ज़ लखनऊ मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल, लखनऊ के साथ डॉ. भानु प्रताप सिंह, निदेशक और प्रेसिडेंट, मिडलैंड हेल्थ केयर एंड रिसर्च सेंटर, महानगर, लखनऊ; डॉ. रवि भास्कर, प्रोफेसर, पल्मोनरी मेडिसिन विभाग, कैरियर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड हॉस्पीटल्स, लखनऊ और डॉ रजनीश कुमार श्रीवास्तव, एमडी पल्मोनरी मेडिसिन (स्वर्ण पदक), पीडीसीसी-इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी (एसजीपीजीआई), सलाहकार पल्मोनोलॉजिस्ट – मेदांता अस्पताल, लखनऊ को एक मंच पर इकट्ठा किया। चर्चा का उद्देश्य इस मूक हत्यारे के प्रभाव को कम करने में बदनामी, चुनौतियों और संभावित समाधानों पर प्रकाश डालना था।
इंडिया टीबी रिपोर्ट 2022 के अनुसार, उत्तर प्रदेश में टीबी रोगियों की संख्या भारत के सभी राज्यों में सबसे अधिक है। यह भारत में टीबी के अधिसूचित मामलों की कुल संख्या के 20% से अधिक के लिए जिम्मेदार है। हेस्टैकएनालिटिक्स द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट की राज्य-वार अंतर्दृष्टि से पता चलता है कि यूपी 2019 से हर साल टीबी के करीब आधा मिलियन (पांच लाख) मामलों की रिपोर्ट कर रहा है। ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2021 के अनुसार, 2020 में टीबी के सभी रूपों में अनुमानित मृत्यु दर 37 प्रति 1,00,000 जनसंख्या (34-40 प्रति 1,00,000) थी।
चर्चा के दौरान डॉ राजेंद्र प्रसाद ने मौजूद लोगों को महामारी के बाद के युग में तपेदिक (ट्युबरकुलोसिस) के वर्तमान परिदृश्य और तपेदिक उन्मूलन के लक्ष्य के बारे में अपडेट किया। उन्होंने कहा, “पूरे इतिहास में, एचआईवी, इबोला और इन्फ्लुएंजा जैसे वायरल संक्रमणों की महामारी ने स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों को बाधित कर दिया है, जिसमें स्थानिक रोगों की रोकथाम और नियंत्रण शामिल है। इस तरह के व्यवधान के परिणामस्वरूप महामारी के बाद की अवधि में टीबी जैसी स्थानिक बीमारियों का बोझ बढ़ गया है। वर्तमान कोरोनावायरस रोग 2019 (कोविड-19) महामारी ने देश भर में तपेदिक (टीबी) की रोकथाम और नियंत्रण में गंभीर शिथिलता पैदा कर दी है। हालांकि, बीमारी के बोझ में विविधता और भिन्नता को देखते हुए, गैर-पारंपरिक हितधारकों जैसे निगमों, नागरिक समाज, युवा लोगों, समुदाय-आधारित संगठनों (सीबीओ) और समुदाय के सदस्यों की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है, जिनमें से सभी टीबी के खिलाफ जंग जीतने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। यूपी में टीबी की निगरानी, निदान, उपचार और निगरानी के लिए प्रौद्योगिकी का व्यापक रूप से उपयोग किया गया है, ऐसा एक निदान जो हम वर्तमान में कर रहे हैं वह है हेस्टैक एनालिटिक्स का संपूर्ण जीनोम परीक्षण जो हमें तेजी से परिणाम दे सकता है, यह सुनिश्चित करता है कि रोगियों को जल्द से जल्द दवाओं का सही संयोजन मिले।”
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